नर हो, न निराश हो
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को।
संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को।
किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को।
करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो।
डॉ अनिल वर्मा
कवि कृषि रसायन में परास्नातक हैं और गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर उत्तराखंड में कृषि रसायन पर शोध कार्य कर चुके हैं।
ये कवि के निजी विचार हैं और समाज में जागरूकता, संवेदनशीलता और बेहतरी के प्रयोजन से लिखे गए हैं।
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शुभकामनाएं
पढ़ने की लिए इच्छा शक्ति, दृढनिश्चय और संकल्प का होना बहुत जरूरी है पढ़ने वाले बच्चों में, तभी वह आगे बढ़ेंगे। और ये इच्छाशक्ति प्रबल होती जाती है जब समय के साथ सराहना करने वाले और पढाई के महत्व को बताने वाले लोग मिलते रहें, यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है |
"प्रशंसा की अपेक्षा के बिना कर्तव्यों का पालन करना अगर हमारी आदत मे आ जाए तो जीवन मे सुकून बढ़ जाए " "if performing duties without expectation of praise or appreciation can be developed as a habit it may contribute peace in our life "