पहले जब छोटी थी तो 26 जनवरी मुझे सिर्फ लड्डू खाने का दिन लगता था और यह पता था कि संविधान इस दिन लागू हुआ था, लेकिन जब बड़ी हुई और मैंने संविधान को कुछ हद तक समझा और यह जाना कि संविधान बनाने के पीछे कितने लोगों की मेहनत लगी है और उससे भी पहले कितने लोगों को इसके लिए कितना बलिदान करना पड़ा है और इसके पीछे कई दार्शनिक मूल्य हैं तब यह जानकर मेरे लिए संविधान के प्रति बहुत आदर बढ़ गया है।
मुझे लगता है कि यह आदर सिर्फ मेरे मन में ही नहीं होना चाहिए बल्कि जितने भी पढ़े लिखे और जागरूक लोग हैं जिनको संविधान के बारे में पता है उनको चाहिए कि वो दूसरों को इन चीजों के बारे में बताएं कि हमारे संविधान में क्या है? हमारे मूल अधिकार क्या है? हमारे कर्तव्य क्या हैं? इन सभी के बारे में लोगों को जागरूक किया जाए खासकर गांव वासियों और मुख्य धारा से कटे हुए तबके को, जिससे कि हम अपने संविधान के बारे में बेहतर और सूक्षमता से जान सकें और इस तरह से हम अपने संविधान के प्रति और गणतंत्र दिवस के प्रति आदर को व्यक्त करे।
संविधान के बारे में जानना सिर्फ संविधान के बारे में जानना ही नहीं है, बल्कि उससे कहीं बढ़कर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना है, खुद को और अपने अधिकारों और दायित्यों को समझना है।
हमें पता होना चाहिए कि अगर हम एक गलत वोट कर रहे हैं तो उसका कितना बड़ा असर हमारे देश पर पड़ रहा है या हम वोट न करके क्या कर रहे हैं? उसका क्या असर हमारे देश पर पड़ता है? हमें पता होना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की सीमा कहाँ तक होती है? भारतीय संविधान में धर्म क्या है? महिलाओं के लिए क्या अधिकार है? स्वतंत्रता क्या है? हम अपने संविधान के अनुच्छेदों का दुरुपयोग न करें, उनका अच्छे से पालन करें, उनको हम बहुत अच्छे से समझें यह हमारे लिए बहुत ज़रूरी है।
हमारे संविधान निर्माता एक धर्म निरपेक्ष और समानता वाला भारत चाहते थे न कि ऐसा भारत जिसमें साम्प्रदायिक उन्माद हो, जो विज्ञान नहीं अंध विश्वास को महत्व दे, वो भारतवासी होकर नहीं बल्कि किसी क्षेत्र विशेष का होकर बोले।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत में ही है *हम भारत के लोग* और आज सच मे बहुत जरूरी है कि हम सही चीजें समझ पाये क्योंकि यही समझेंगे तो सही लोगों को शक्ति मिलेगी और उसी से ये देश बदलेगा। हमें साथ आने की जरूरत है हमें भारतवासी सबसे पहले होने की जरूरत है। आइए साथ मिलकर एक संकल्प ले कि जिन लोगों को संविधान के बारे में पता है वो दूसरों को समझाएंगे और जिनको नहीं पता वो पढ़ेंगे और समझेंगे।
आइए हम जिम्मेदारी ले अपने भारत को फिर से महान बनाने की, उसकी खोयी हुई प्रतिष्ठा वापस लाने की।
आइए गणतंत्र दिवस कुछ ऐसे मनाए,
कि हर दिन गणतंत्र दिवस बन जाए।
गणतंत्र दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, वो अपनी समझ और लेखन कौशल से समाज में स्पष्टता, दयालुता, संवेदनशीलता और साहस को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
यह लेख पढ़ते समय यदि आपको असहजता महसूस हो, तो यह असहजता व्यर्थ नहीं है, यह वही बेचैनी है, जो तब होती है जब कोई हमें आईना दिखा देता है।
हम अक्सर समाज, व्यवस्था और लोगों को दोष देते हैं, पर यह देखने से बचते हैं कि कहीं हम स्वयं ही उस गलत का हिस्सा तो नहीं बन रहे, जिसका रोना रोज़ रोते हैं।दुनिया ऐसे लोगों से भरी पडी है जो वही पढ़ते हैं जो उन्हें सोचने से बचाए, वही सुनते हैं जो उन्हें हँसाकर टाल दे और वही देखते हैं जो उन्हें ज़िम्मेदारी से दूर रखे। फिर भी हम उम्मीद करते हैं कि समाज बदल जाए, विचार ऊँचे हो जाएँ और लोग ईमानदार बन जाएँ। यह कैसी उम्मीद है, जो गलत को ताकत देकर सही से की जाती है?
जो लोग सच बोलते हैं, कठिन सवाल उठाते हैं और हमारी सुविधाजनक सोच को चुनौती देते हैं, उन्हें हम अनदेखा कर देते हैं। उन्हें उबाऊ, नकारात्मक या अव्यावहारिक कहकर किनारे कर दिया जाता है, पर जो लोग हमें बहलाते हैं, हमारी सोच को सुन्न करते हैं और भीड़ के स्वाद के अनुसार परोसते हैं, उन्हें हम सर आँखों पर बिठा लेते हैं। क्या यह चयन हमारी मानसिकता को उजागर नहीं करता?
हम शिकायत करते हैं कि आज कोई अच्छा नहीं लिखता, कोई ईमानदार नहीं रहा और कोई बदलाव नहीं चाहता। जबकी इसके ही समान्तर एक और सच्चाई यह है कि जब कोई सच में ईमानदारी से लिखता है या बदलाव की बात करता है, तो उसे पढने वालों कि संख्या कम ही मिलती है, क्योंकि ऐसा लेखन हमें कठघरे में खड़ा करता है, और खुद से सवाल करना हमें सबसे ज़्यादा असहज करता है।
हम गलत लोगों से सही काम की उम्मीद इसलिए करते हैं क्योंकि यह आसान है। खुद खड़े होना कठिन है, खुद बोलना जोखिम भरा है और खुद कुछ अलग करना असुविधाजनक है। इसलिए हम भीड़ में सुरक्षित रहना पसंद करते हैं।
वही भीड़ जो गलत को लोकप्रिय बना सकती है और फिर कहती है कि नेता खराब हैं, लेखक बिक गए हैं या व्यवस्था में खामियां आ गई हैं|
व्यवस्था की खामियों की तरफ इशारा करने वाले लोगों में अधिकतर, उसी व्यवस्था को रोज़ मज़बूत भी तो कर रहे हैं!
"हम जिन विचारों को समर्थन देते हैं, जिन लोगों को आगे बढ़ाते हैं और जिन बातों पर चुप रहते हैं, वही समाज की दिशा तय करती हैं।"
फिर भी हम अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने से बचते हैं।
हम दोहरे मानक वाला इंसान नहीं कहलाना चाहते, पर सच यह है कि हम में से ज्यादातर सुविधावादी हो चुके हैं। और सुविधावाद धीरे-धीरे समाज की आत्मा को खोखला कर देता है। अमूमन लोग सही का साथ तभी देते हैं, जब उसमें हमें कोई असुविधा न हो।
यदि सच में बदलाव चाहिए, तो पहले यह देखना होगा कि हम किसके साथ खड़े हैं, किसे पढ़ रहे हैं और किस चुप्पी को हम समझदारी समझ रहे हैं।
क्योंकि गलत का साथ देकर सही की उम्मीद करना, समाज के साथ किया गया सबसे बड़ा छल है।
यदि यह लेख आपको चुभा हो, तो इसे नज़र अंदाज़ मत कीजिए, संभव है, यही चुभन उस बदलाव की शुरुआत हो, जिसकी बात हम हमेशा दूसरों से करते आए हैं।
- सोनम वर्मा
सीतापुर, उत्तर प्रदेश
उदीयमान लेखिका एवं कवयित्री सोनम वर्मा जी, इतिहास, राजनीति विज्ञान एवं अर्थशास्त्र विषयों में स्नातक हैं और इतिहास विषय में स्नातकोत्तर| शैक्षिक कार्यों के उद्देश्य हेतु बी.एड. किया तथा वर्तमान में एम.एड. में अध्ययनरत हैं|
आपको सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन में विशेष रुचि है| सामाजिक सरोकारों के साथ ही शैक्षिक एवं मानवीय विषयों पर लेख एवं कविताएँ लिखना आप अपना शैक्षिक दायित्व समझती हैं|
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |
शुभकामनाएं
"अब्बू हमें इस बार ईदी में गिफ्ट और पैसे नहीं चाहियें"। नौ वर्षीय सुहेल ने अपने अब्बा सेे कहा, तो रहमत खां हैरान रह गये।
" मेरे बच्चे,तुझे ईदी नहीं चाहिये, तो और क्या चाहिए,तू बता मुझे! तू कहे तो मैं तेरे कदमों में जन्नत ला कर रख दूं "।
रहमत मियां बेटे को गोद में उठा कर उसे प्यार से चूमने लगे।
सुहेल ठुनते हुए कहने लगा " नहीं अब्बू!! जन्नत नहीं, एक वादा चाहिये आपसे। और सुहेल की हां में हां मिलाते हुए सारे बच्चों ने भी शोर मचा दिया " हांं हमें वादा चाहिये, वादा "।
" कैसा वादा मेरे बच्चों"!! बताओ तो सही?
"अब्बू हमने सुना है कि खुदा पाक ने हजरत इब्राहिम से उनकी सबसे अज़ीज़ चीज़ कुर्बान करने के लिये कहा था और उन्होंने अपने बेटे को कुर्बानी के लिए पेश किया था।"
" हांs.. मगर इससे तोहफे का क्या रिश्ता है बच्चों?"
"अब्बू तब खुदा पाक ने खुश होकर उनके बेटे की जगह बकरा रख दिया था। क्या ये सच है अब्बू" ।
"हां ये सच है, तो तुम क्या चाहते हो"।
"अब्बू हम चाहते हैं कि आप भी अपने अज़ीज़ बच्चों को कुर्बानी पर रखें और खुदा पाक खुश होकरउसके बदले बकरा रख देंगे"।
बच्चों के मासूम सवाल से रहमत मियां कांप उठे।दोनों हाथ कानों पर रख लिये " ला-हौल-बिला-कुव्वत!! ये क्या बोल रहे हो!! कहीं ऐसा होता है भला! वो दौर और था बच्चो!यदि तुम्हें कुछ हो गया तो हम जीते जी मर जायेंगे। नहीं नहीं..."।
अच्छा!! बच्चों ने कुछ सोचते हुए कहा "तो फिर एक वादा करो कि इस बार आप मासूम जानवरों का खून नहीं बहाओगे, आप कुर्बानी के लिए आटे,गुड़, मिट्टी या कागज से बने बकरे को ही हलाल करोगे"
"हाँ ये बात मानली तुम्हारी!" कह कर रहमत खां ने राहत की सांस ली।
सुनीता त्यागी
राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद
ईमेल : sunitatyagi2014@gmail.com
आदरणीय सुनीता जी की रचनाएं हमे मानवीय संवेदना, मानवीय भावना के विभिन्न रूप और तीव्रताएं यथा प्रेम, परवाह, चाह और संकल्प इत्यादि, नज़र की सूक्ष्मता, सामाजिक संघर्ष और विसंगतियों पर प्रकाश डालती और लोगों मे संवेदना और जागरूकता जगाने का सफल प्रयत्न करती दिखती हैं, इनकी रचनाएँ पढ़कर खुद को एक संवेदी और व्यापक सोंच और दृष्टिकोण वाला इंसान बनाने मे मदद मिलती है |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |
शुभकामनाएं
लगभग, सबकुछ योगेन्द्र यादव सर ने कहा दिया, वीडियो देख लीजिए:
https://youtu.be/C2T153GAmKo?si=0DtS5GjmHKmr6E0G
शुभकामनाएं
लवकुश कुमार
अक्सर लोगों को बात करते सुना है कि " दान तो हम भी करते हैं लेकिन बताते नहीं फिरते या वाट्सऐप स्टेटस नही लगाते! "
आज के बदलते परिदृश्य में जब आम इंसान स्व केंद्रित होता जा रहा और उसकी व्यक्तिगत चाह और आवश्यकताएं इतनी बढ़ती जा रही हैं कि दूसरों की तकलीफ़ या सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए उसके लिए समय, पैसा या अन्य संसाधन निकाल पाना मुश्किल होता जा रहा है, तब ऐसी हालत में किसी इंसान की व्यक्तिगत मदद में उसकी गोपनीयता का सम्मान करते हुए, अन्य संस्थागत मामलों में सामाजिक सरोकार के किए गए कार्यों का निस्वार्थ प्रचार एक निंदनीय नहीं सराहनीय कार्य है, इससे अन्य लोग प्रेरित होंगे और अपने व्यक्तिगत समस्याओं के निवारण के साथ सामाजिक सरोकार के कार्यों के लिए भी प्रयत्न करेंगे, यथा: रक्तदान, श्रमदान, संस्था को वित्तीय मदद, वस्त्रदान इत्यादि।
- आरती
लेखिका संस्कृत में परास्नातक हैं और हिंदी में परास्नातक की विद्यार्थी साथ ही सामाजिक मुद्दों और राष्ट्रहित के मामलों पर चिंतन उनकी दिनचर्या की प्राथमिकताओं में शामिल है।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
दहेज प्रथा: यह एक ऐसी प्रथा है जिससे शायद ही किसी भारतीय को परिचित कराना पड़े। सदियों से चली आ रही इस प्रथा को कुप्रथा कहना ज्यादा सही होगा। इस शब्द को आप यदि न्याय संगत नहीं पाते हैं तो कोई और शब्द सुझाया जा सकता है।
इतिहास के बारे में कुछ बातें:-
यह प्रथा कब से शुरू हुई, इसका कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। पर पहले गायों को शादी के समय लड़की के साथ भेज दिया जाता था क्योंकि गाय का दूध लड़की ही दुहती थी इसीलिए लड़की के ससुराल जाने पर गाय उदास रहती थी, इसी कारण गायों को भी साथ भेज दिया जाता था।
रामचरितमानस में भी राजा जनक द्वारा अपनी पुत्री को संपदा देने का प्रमाण है, राजा जनक व उनके भाइयों के कोई पुत्र भी नहीं था। अतः वह पूरा राज्य उन की सभी भाइयों की बेटियों का ही हुआ।
वर्तमान संदर्भ में आज लड़के वाले लड़की के घर आते है, बहू बना कर लड़की ले जाते हैं। एक तो वर पक्ष किसी के द्वारा पहले पालन पोषण की गई लड़की को अपने घर लाता है और ऊपर से उसके पिता से पैसे की मांग करते हैं, उसके बाद भी न जाने कितने ही रस्मों के नाम पर दहेज, कपड़े, फर्नीचर पता नहीं क्या-क्या मांगते हैं!, जब बेटी के बच्चे होते हैं तब भी उनसे बहुत कुछ मांगते हैं सब कुछ बेस्ट चाहिए होता है, यदि कुछ अच्छा नहीं हुआ तो आप मंडली बिठाकर चर्चा करना शुरू कर देते हैं।
हमें सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात का होता है कि कैसे एक लड़की को दहेज के नाम पर ताना मारने वाली अक्सर सास और ननद होती हैं जिस सास ने पहले ही ये सब झेल रखा होता है, पता नहीं सास बनते ही उसकी सारी संवेदनशीलता कहां चली जाती है? वही सास जब बेटी को दहेज देती है तो मन ही मन सास और उसकी बेटी दोनों को ही बुरा लगता है।
अब आते हैं इस कुप्रथा के दुष्प्रभावों पर
आप दहेज से की डिमांड करते ही अपने घर में आने वाले सदस्य के मन में अपने प्रति अनादर का भाव भर देते हैं। भले ही वर पक्ष यही क्यों ना कहे कि यह सब आप अपनी बेटी को ही तो दे रहे हैं, बेटी भी जानती है कि ससुराल में वह किस सामान का कितना प्रयोग करेगी?
यह समझना बहुत अचरज का काम है कि कैसे कोई किसी से इतना धन लेने के बाद भी अपनी अकड़ दिखा सकता है इससे दामाद अपने ससुराल वालों की नजरों में भी वह नहीं रहते जो उन्हें होना चाहिए, उन परिवारों को छोड़कर जहां इतनी संपत्ति है कि ये कुप्रथाएं कोई खास असर नहीं छोड़तीं।
अब यदि वर पक्ष चाहे कि वह नया सदस्य आपके घर को अपना माने, मन से सब की सेवा करें, सबसे घुल मिलकर रहे! लेकिन एक बार सोचिए, दहेज मांग कर क्या एक अच्छे इंसान की छवि बच पाई।
फिर दो तरह की परिस्थितियां आ सकती हैं कि एक तो पारिवारिक शांति के लिए मिलकर रहा जाए और दूसरी की प्रतिशोध की भावना से परायों जैसा व्यवहार!
जब बहू घर को अपना मानती है, घर में शांति रहती है परस्पर सम्मान की भावना होती है तो घर में निरंतर लक्ष्मी आती है और उस शांति की संभावना अगर पहले ही भंग कर दी गई हो तो ?
इसका सबसे बड़ा परिणाम क्या होता है कि हमारे समाज में कन्या भ्रूण हत्या होती है, जिंदगी भर बेटी को सही पोषण, शिक्षा, सम्मान कुछ नहीं मिलता क्योंकि आगे चलकर दहेज देना है तो वही पैसा दहेज के लिए बचत में लगाया जाने लगता है, माता पिता और भाई, तनाव में रहकर चिड़चिड़े हो जाते हैं सो अलग।
मां-बाप बेटी के जन्म के बाद से ही तनाव में रहते हैं, जिस बच्ची के आने पर मां-बाप को खुश होना चाहिए था, वह दुखी हो जाते हैं।
आश्चर्य की बात यह है कि लड़का जितनी अच्छी नौकरी करता है उतनी ही ज्यादा दहेज की मांग करता है !
आज जरूरत है कि बेटियों को इतना सक्षम बनाया जाए कि वह दहेज प्रथा का मुह तोड़ जवाब दे सके। लड़कों को भी इसके परिणाम समझने होंगे। यदि एक समय में लड़का और लड़की अपने हाथ में दहेज के प्रति विद्रोह की मसाल उठा ले तो इसको प्रथा का अंत हो सकता है। हमें लकीर का फकीर नहीं, कुछ अलग और सार्थक करने की जरूरत है।
आपने दहेज के चलते बहुओं की प्रताणना के बारे में सुना होगा और ये भी सुना होगा कि दहेज प्रथा अधिनियम का दुरूपयोग कर कई परिवार बर्बाद कर दिए गए, इसीलिए यह सोचने की जरूरत है कि अगर दहेज प्रथा जैसी शोषणकारी व्यवस्थाएं न होती तो यह अधिनियम भी न होता और न इसका दुरूपयोग!
दहेज प्रथा की जड़ में एक और बात है, सजातीय विवाह जिसके चलते सीमित विकल्प वधु पक्ष को दहेज देने को मजबूर करते हैं और तो और दहेज की सामर्थ्य न होने पर एक काबिल लड़की एक नाकाबिल इंसान के साथ बांध दी गई, इसके भी कई उदाहरण हैं।
जिन गरीब और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में कमाने खाने और शिक्षा एवं स्वास्थ्य के भी उचित प्रबंध नहीं वो भी दहेज इकट्ठा करने के दबाव में बीमार भी होते हैं, चिड़चिड़े भी और कभी कभी ग़लत कामों में लिप्त भी।
इस प्रथा के दोषी वो भी हैं जो प्रतिष्ठा प्रदर्शन के चलते महंगी शादियों के ग़लत उदाहरण पेश करते हैं, हम सभी को पुनर्विचार करने की जरूरत है।
- लवकुश कुमार एवं सौम्या गुप्ता
लवकुश कुमार भौतिकी में परास्नातक हैं और उनके लेखन का उद्देश्य समाज की उन्नति और बेहतरी के लिए अपने विचार साझा करना है ताकि उत्कृष्टता, अध्ययन और विमर्श को प्रोत्साहित कर देश और समाज के उन्नयन में अपना बेहतर योगदान दिया जा सके, साथ ही वह मानते हैं कि सामाजिक विषयों पर लेखन और चिंतन शिक्षित लोगों का दायित्व है और उन्हें दृढ़ विश्वास है कि स्पष्टता ही मजबूत कदम उठाने मे मदद करती है और इस विश्वास के साथ कि अच्छा साहित्य ही युवाओं को हर तरह से मजबूत करके देश को महाशक्ति और पूर्णतया आत्मनिर्भर बनाने मे बेहतर योगदान दे पाने मे सक्षम करेगा, वह साहित्य अध्ययन को प्रोत्साहित करने को प्रयासरत हैं।
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं,उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
जिस तरह बूँद-बूँद से सागर बनता है वैसे ही एक समृद्ध साहित्य कोश के लिए एक एक रचना मायने रखती है, एक लेखक/कवि की रचना आपके जीवन/अनुभवों और क्षेत्र की प्रतिनिधि है यह मददगार है उन लोगों के लिए जो इस क्षेत्र के बारे में जानना समझना चाहते हैं उनके लिए ही साहित्य के कोश को भरने का एक छोटा सा प्रयास है यह वेबसाइट ।
लेखक के विजन के बारे में जानने के लिए यहां क्लिक करें।
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल करें।
मेरी सीमित समझ में कुछ विश्लेषण और कुछ उपाय:
महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं को निर्णय की शक्ति देना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना, कहा जाता है कि महिलाएँ अगर नौकरी करें, उन्हें पैसे मिले तो वो सशक्त होंगी लेकिन हो सकता है कि उनके पास यही निर्णय लेने की शक्ति न हो कि उन्हें ये पैसे खर्च कहाँ करने है तो ये सशक्तिकरण हुआ ही नहीं। अच्छी शिक्षा, अच्छा पोषण, समान अवसर जरूरी है।
क्या करे कि महिलाएं सशक्त हो?
जब बच्ची छोटी हो उसे पूरा पोषण युक्त भोजन दीजिए, लड़की होने के कारण उसे बासी या बेकार खाना मिलना उसके सशक्तिकरण में बाधक है।
बच्चियों को सही शिक्षा दिलवाएँ और वो ऊँचे से ऊँचा जो भी पढ़ना चाहे उसका यथासंभव प्रयत्न करें साथ ही आध्यात्मिक शिक्षा भी दें जिससे वह सीख सके कि वो देह नहीं चेतना है।
उसको कंप्यूटर तथा अन्य आधुनिक तकनीकी शिक्षा भी दिलाएँ, जिससे अगर जब भी उसे नौकरी करना हो वो उसके लिए योग्य हो।
एक सबसे अहम् पहलू है कि महिलाओं को अपनी फिटनेस का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है, खेल, व्यायाम जैसी गतिविधियां हों उनकी दिनचर्या में क्योंकि बचपन से ही उन्हें उछलने-कूदने- खेलने की आजादी उन्हें शारीरिक के साथ मानसिक रूप से भी मजबूत करेगी।
बचपन से ही उसके मन में ये न भरे कि वो पराई है, पराए घर जाना है। ऐसी भावनात्मक आघात वाली छोटी- छोटी बातें बेटियों को अंदर तक खत्म कर जाती हैं और उनका जीवन में कुछ बड़ा सोचने और करने का उत्साह कम या खत्म हो जाता है।
२०२० में इतिहास के एक सर्वेक्षण में सामने आया था कि महिलाएँ भी पहले शिकार पर पुरुषों के साथ जाती थी। अभी हाल ही में भी एक ऐसा ही सर्वेक्षण सामने आया था। ये सर्वेक्षण बताते है कि महिलाओं के दिमाग में हमने अगर ये कमजोरी का कीड़ा न बिठाया होता तो वो आज अधिकांश क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर होतीं।
आदर्श स्थिति यह है कि जैसे पुरुष सशक्तिकरण जैसी कोई स्थिति नहीं होती वैसे ही महिला सशक्तिकरण जैसी कोई बात ही न करनी पड़े। पर यह एक आदर्श स्थिति है जिसे पाने में शायद दशकों लगे पर ये शुरुआत तो की जा सकती है और ये शुरुआत हमें ही करनी होगी।
-सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं,
उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |
शुभकामनाएं
आज से कुछ साल पहले जब मैं कोई सीरियल या कोई फिल्म देखती थी तब मुझे वहां की स्वच्छता, वहां बड़े- बड़े घर, और बहुत सारी चीजें देख कर यह मन करता था कि काश यह सारी चीजें मेरे पास भी होती। इसीलिए मैं अपने घर को वैसा रखने की कोशिश करती थी लेकिन एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार और एक उच्च वर्ग के बीच समानता लाने की सोच भी जैसे एक बेवकूफी भरी सोच ही थी, लेकिन तब यह समझ नहीं थी कि चीजें सच में कैसी होती हैं? बस मैं यह सारी चीजें करना चाहती थी लेकिन जब मैं बड़ी हुई और चीजों को समझा और देखा की फिल्म की शूटिंग कैसे होती है तो मैंने देखा कि वहां पर जहां बड़ा घर होता था, वहां कुछ सेटअप ही था।
अब मैं सोचती हूं तो हँसी आती है कि मैं कितने बेवकूफी भरे सपने संजो रही थी। यहां मैंने यह इसलिए बताया है कि आप जब फिल्मों को या सीरियल्स को देखें तो इस बात का ध्यान रखें कि उसमें सच्चाई हो सकती है लेकिन पूरी फिल्म सच्ची हो जरूरी नहीं, नाटकीय रुपांतरण और असली हालात को पर्दे पर लाने की सीमित क्षमता, जैसे पहलू भी ध्यान रखें और नकल करने की कोशिश न करें, जरूरत नहीं, अपने विवेक से काम लें और इस बात को ध्यान रखें कि इंसान उन चीज़ों के लिए ही परेशान रहता है जिसकी उसे सबसे कम जरूरत है।
लोग सिनेमा से कितना ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं? इसके बारे में कुछ कहना चाहती हूं जब हिटलर जर्मनी में शासक बना, उस समय वहाँ जो लोग कभी एक चींटी तक नहीं मार पाते थे, वह लोग इंसान तक को मार देने लगे थे, ऐसा वहां यहूदियों के प्रति फैलाई गई घृणा के कारण हुआ था।
लेकिन अब जर्मनी में जो नरसंहार हुआ था उसके चिन्ह रखे हुए हैं, लोग वहां पर जाते है तथा अपने पूर्वजों की गलतियों पर दुःख प्रकट करते हैं।आज जर्मनी एक विकसित राष्ट्र है।
प्रेम के उथले स्वरूप को भी कुछ गैर जिम्मेदाराना फिल्मों के चलते ही तवज्जो मिली और अनगिनत युवा डिप्रेशन की गर्त में चले गए।
आप भी सिनेमा, सीरिअल और न्यूज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। आप अगर यह समझना चाहते है कि कानून और राजनीति कैसे हमारे सिनेमा या सीरिअल को प्रभावित करते है तो आप महिलाओं के लिए बनने वाले कानून और उनके समानांतर बनने वाले सीरिअल या फिल्म देखे, पहले महिलाओं को सिर्फ घर तक सीमित दिखाया गया है, फिर नर्स या टीचर के रूप में, फिर पुलिस या वकील के रूप में और अब आज के समय में महिलाओं पर भी हर तरह के रोल फ़िल्माये जाते है।
इसी तरह हमारे समाज में जिस विचारधारा की प्रबलता होती है, वो चाहे धार्मिक, सामाजिक,राजनीतिक,सांस्कृतिक उनकी छाप सिनेमा और सीरियल पर पड़ती ही है।
आप जब इन्हें देखे तो पूरा सच न माने, सच इसके आगे और इससे ज्यादा भी हो सकता है और अक्सर होता ही है। आज आपके पास इन्टरनेट है, आप जो देख रहे है, उसके विपरीत या उसकी समीक्षा भी देखिये या आप खुद उन चीजों पर विचार कर ले।
शुभकामनाएं
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |
शुभकामनाएं
मैं अक्सर सोचती हूँ कि कुछ लोग बिना काम किए ही कैसे सम्मान पा सकते हैं? लोगों के पास खूब पैसा होता है सिर्फ इसलिए!, भले ही वह काम के मामले में बहुत कम ही काम क्यों न करें।
ऐसा क्यों होता है? शायद ऐसा इसलिए क्योंकि अधिकतर लोगों की सोंच अब सामंतवादी हो चुकी है, कि जो काम नहीं करता है वही एक अच्छा जीवन जी रहा है और इसीलिए यह सम्मान देने योग्य इंसान है।
लेकिन हमारी भारतीय सभ्यता इससे बहुत ही अलग है अगर हम राजा जनक की बात करें तो वह भी बिल्कुल भी श्रम को कम महत्व नहीं देते थे। कृष्ण भी अपनी गायों को खुद चराते थे।
अगर हम भारतीय इतिहास की बात करें तो महात्मा गांधी भी श्रम को बहुत महत्व देते थे और अपना रोज़ का काम खुद से ही करते थे, वो किसी से अपना काम नहीं करवाते थे।
फिर हम लोगों के अंदर ऐसा भ्रम क्यों बैठा हुआ है कि जो श्रम करता है, वो कम सम्माननीय है। श्रम न करना, मन के द्वारा आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए किया गया एक खेल मात्र है।
श्रम करना शरीर की और आत्मा की जरूरत है, डार्विन का सिद्धांत है, उत्तरजिविता का सिद्धांत, जिसमें जो प्राणी लड़ता नहीं है, अपने जिन अंगों का उपयोग नहीं करता वो धीरे धीरे समाप्त हो जाते है, बिना श्रम के आप अपने शरीर का ही प्रयोग नहीं कर रहे है, उपरोक्त सिद्धांत के आधार पर आप अपना निष्कर्ष निकाल सकते हैं।
जिस दिन हम संघर्षों को और काम को सम्मान देना सीख जाएंगे, उस दिन हमारी बेरोजगारी की समस्या काफी हद तक कम हो जाएगी। आज बेरोजगारों में काफी लोग ऐसे हैं कि उन्हें कोई ऐसा काम नहीं मिल पाता है जो समाज की नजरों में सम्मानजनक हो!
ज्यादातर सम्मान वाले काम इस नजरिये से देखे जाते है कि इसमें काम कितना कम है, इसीलिए लोग सालों साल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगे रहते है और बेरोजगार रहते है।
बेरोजगारी जो हर बार चुनावी मुद्दा भी बनता है, वो इसलिए है क्योंकि लोग श्रम का सम्मान नहीं करते, मेरा व्यक्तिगत रूप से यही मानना है कि जब हम काम करना चाहते हैं तो काम मिल जाता है, उसमें पैसे कम हो सकते है लेकिन काम मिल जाता है।
किसी भी इंसान का सम्मान इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि वो सफल हुआ या नहीं? उसको पैसे मिले, कितने मिले, बल्कि इस आधार पर करना चाहिए कि उस इंसान ने अपने उद्देश्य को पाने के लिए मेहनत कितनी की थी और कितने दिल से की थी, साथ ही उसका उद्देश्य कितना सच्चा था अगर उसकी मेहनत सच्ची है तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए।
यही नजरिया बेरोजगारी को कुछ हद तक कम करने का शायद सबसे अच्छा और सबसे सही तरीका हो सकता है, तब ही ज्यादा से ज्यादा लोग संघर्ष को गले लगाकर कुछ नया, कुछ लीक से हटकर करने का जोखिम उठा पायेंगे क्योंकि तब लोगों के द्वारा उपहास की आशंका कम हो चुकी होगी।
शुभकामनाएं
- सौम्या गुप्ता
बाराबंकी उत्तर प्रदेश
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |
शुभकामनाएं
संपूर्ण पुरुष समाज को समर्पित:-
मैं बचपन से ही इस बात को लेकर बहुत चिढ़ती थी कि भगवान ने मुझे लड़की क्यों बनाया? इतनी पाबंदियाँ झेलनी पड़ती है। लेकिन जब थोड़ी समझदार हुई, तो समझ आया कि लड़का होना भी आसान नहीं है। घर में अगर एक बेटा हो या बड़ा बेटा हो तो पिता की तबियत बिगड़ते ही वह बड़ा बेटा, चाहे जितना ही छोटा क्यों न हो, घर की सारी जिम्मेदारी संभालने की कोशिश में लग जाता है। मैंने महिलाओं को अक्सर यह कहते सुना है कि हमें तो कभी छुट्टी नहीं मिलती, और एक सीमा तक यह सच भी है कि महिलाएँ पुरुषों से ज्यादा घंटे काम करती हैं।
पर एक पक्ष यह भी है कि महिलाएँ बीमार होने पर थोड़ा कम खाना बना सकती हैं, कुछ काम कम कर सकती हैं, अगर परिवार अच्छा है तो, पर पुरुषों के पास यह सुविधा नहीं होती। लगभग हर मध्यमवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार का पुरुष न बीमार होने पर जल्दी डाॅक्टर के पास जा पाता है, न कोई छुट्टी लेता है। जब तक वो ल़डका रहता है,घर की जिम्मेदारियों से तालमेल, फिर बहन की शादी, फिर अपनी शादी और घर में वो भी उलझा सा ही रह जाता है।
भावनात्मक रूप से अगर कोई पुरुष टूट भी जाए, तो वो किसी के सामने रो भी नहीं सकता क्योंकि हमारे समाज में ये भ्रम फैला हुआ है कि 'मर्द को दर्द नहीं होता'। लड़कियों और महिलाओं से ये अभिव्यक्ति तो नहीं छीनी जाती। मुझे लगता है कि ये धारणा टूटनी ही चाहिए और महिलाओं को ये मोर्चा उठाना चाहिए कि वो हर तरह के इमोशन को अभिव्यक्त कर सकें और साथ ही पुरूषों को भी अपनी हर तकलीफ़ साझा करने के लिए प्रोत्साहित कर सकें, ऐसा महिलाओं को ही इसलिए करना चाहिए कि वो ही माँ, बहन, पत्नी के रूप में पुरुष के जीवन में सिखाने में सबसे अहम् भूमिका निभाती है।
अमूमन पुरुषों में हार्ट अटैक तथा अन्य ऐसी ही तनाव से जुड़ी हुई बीमारियों ज्यादा होती है क्योंकि वो अपने इमोशन को दबाकर करते है। मैंने पढ़ा था कही 'बिन घरनी घर भूत का डेरा' पर इस समाज को और देश को जितनी महिलाओं की जरूरत है उतनी पुरुषों की भी।
आज झूठे महिला सशक्तिकरण की आड़ में पर जो महिलाएँ यह कहती है कि पुरुषों ने हमारा दमन किया है तो अब हम भी करेंगे, उनसे मेरा कहना है कि हमारी शक्ति सृजन की है, विनाश की नहीं। दुनिया को आधा पुरुषों ने नष्ट कर दिया तो दुनिया को आधा हम भी नष्ट करेंगे- ये नहीं करना।
साथ मिलना है महिला और पुरुष दोनों को, चेतना के स्तर पर दोनों एक हो और दोनों मिलकर इस समाज, देश और दुनिया को बचाएं।
"इस दुनिया को प्यार की जरूरत है, बदले की नहीं। "
जो हमारे जीवन में एक अहम भूमिका निभाते है, हम सबको जरूरत है कि हम उनके प्रति पूर्वाग्रहों से मुक्ति पाए।
पुरुषों में भी संवेदना होती है, आप जयशंकर प्रसाद की रचना, नारी तुम केवल श्रद्धा हो, रचना पढ़ सकते है। कितने ही गाने ऐसे है जिनमें महिलाओं को पुरुष कितना अच्छे से समझ सकते है उनको आप समझ सकते हैं, एक गाने की लाइन है, मेरी छाया है जो, आपके घर चली, सपना बनके मेरी आँखों में है पली, मैंने जब ये देखा कि इसको लिखने वाला भी एक " पुरुष" है तो मेरे लिए ये चौकाने वाली बात थी, इसीलिए पुरुषों के प्रति अपनी अवधारणाओं को बदलने की जरूरत है।
शुभकामनाएं
- सौम्या गुप्ता
सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे |
अगर आपके पास भी कुछ ऐसा है जो लोगों के साथ साझा करने का मन हो तो हमे लिख भेजें नीचे दिए गए लिंक से टाइप करके या फिर हाथ से लिखकर पेज का फोटो Lovekushchetna@gmail.com पर ईमेल कर दें
फीडबैक / प्रतिक्रिया या फिर आपकी राय, के लिए यहाँ क्लिक करें |
शुभकामनाएं