बचपन से न जाने कैसे गुजर कर
बेटियां
औरत बन जाती हैं
और
बना दी जाती हैं
पहले से ज्यादा मजबूत
जिन औरतों की हथेलियों पर तैरकर
बच्चे जवान हुए
जिसने अपनी पीठ को घिसकर
उन्हे और मुलायम बनाया,
जिनकी धरती रह ही नहीं सकती कभी सहज
जो दिन-रात
अपने बच्चों के लिये
खड़ी रही
दिहाड़ी के मजदूरों की तरह
वे आज खुद बंट रही है अपने ही घरों में
ले रही हैं मुर्दा सांसें
और
लगातार स्थानांतरित की जा रही हैं आश्रमों की ओर
यह दंश हमारे विभाजन से ज्यादा गहरा है
कोई कह दे कि
दुनियों की कोई माँए सहनशील नहीं रही
जिसने घर को जोड़ने के लिये
मशक्कत न की हो
जिसने कभी गद्दारी की हो अपने बच्चों के लिये
जो औरते ताप के दिनों में भी
अपने बच्चों को पीठ पर ढोया करती हैं
वे ही ज्यादा शिकार हुई है घरों में
औरतें औरत होती नहीं
बल्कि
सामाजिक मर्यादाओं को पालते-पालते
बना दी जाती हैं।
पूजा कुमारी
coolpooja311@gmail.com
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