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 चिम्मी और जिम्मी ( समझ को विस्तार देने वाली बालकथा ) - मीरा जैन

चिम्मी खरगोश ने जब से होश संभाला स्वयं को चाची के साथ छोटे से बगीचे की मुलायम घास पर या फिर बारिक तारों से बने पिंजरे में ही पाया।

बाहर की दुनिया से वह बिल्कुल अंजान था, दोस्त के नाम पर केवल घर की मालकिन अर्थात् चाची ही थी| चाची उसका पूरा ख्याल रखती थी उसे नहलाती धुलाती , खाना खिलाती यहां तक की उसके साथ खूब खेलती भी थी इसीलिए चिम्मी को कभी अकेलापन महसूस नही होता फिर भी बाहर की दुनिया देखने की लालसा उसके मन में सदैव बनी रहती , सोचता- ' चाची तो ले नहीं जाती हैं कभी मौका मिला तो बाहर अकेले ही घूम आऊंगा'

यूं तो वह हमेशा खुश रहता किंतु जब भी पड़ोसी के भारी-भरकम कुत्ते जिम्मी पर नजर पड़ती तो उसका डील-डौल और आंखें देख यह सोच डर जाता कि कभी इसे मौका मिला तो निश्चित ही मुझे खा जाएगा, इसीलिए वह कभी जिम्मी की ओर देखता ही नहीं, कभी अनायास उससे नजरें मिल जाती तो भयभीत हो जाता। अपने और चाची में मस्त चिम्मी आराम से अपना जीवन व्यतीत कर रहा था। लगभग यही बंधी बंधाई जिंदगी जिम्मी की भी थी फर्क बस इतना था उसका मालिक दोनों टाइम उसे बाहर घूमाने ले जाता , बस ! यही बात चिम्मी को अखरती कि चाची उसे भी बाहर घूमाने क्यों नहीं ले जाती है ?

       एक दिन की बात है चिम्मी, चाची के साथ बगीचे में उछल-कूद कर ही रहा था तभी अचानक चाची से मिलने कोई आ गया, चाची गेट खोल उससे बात करने लगी ही थी कि मौका देख चाची से नजर बचाते हुए चिम्मी बिना सोचे समझे चुपचाप गेट से बाहर निकल गया और सामने खुला मैदान देख दौड़ लगा दी, अपनी इस सफलता पर वह फूले नहीं समा रहा था उसे ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे सारा जहां उसके कदमों में समा गया है। 

          कुछ देर पश्चात चाची को चिम्मी का ध्यान आया उसे बगीचे में न पा वह चिंतित हो गई और उसे घर से लेकर आस-पास बाहर तक ढूंढ लिया किंतु वह कहीं नजर नहीं आया , चाची को समझ में आ गया कि गेट खुला था और वह बाहर कहीं दूर निकल गया है, चाची उसके जान के खतरे को भांप पसीने से तरबतर गेट बंद कर उसे ढूंढने निकल पड़ी। 

            चिम्मी यहां-वहां कुलाचे भर ही रहा था कि सड़क के एक कुत्ते की नजर उस पर पड़ गई और वह ललचाई नजरों से चिम्मी की ओर बढ़ने लगा, कुत्ते को अपनी ओर आता देख चिम्मी घबरा गया, उसे अपनी मौत सामने दिखाई दे रही थी, उसे बेहद पछतावा हो रहा था कि इस तरह चुपचाप अकेले घर से बाहर क्यों निकल आया उसने चाची को नहीं बल्कि खुद को ही धोखा दिया है , अब क्या करें? उसने मन ही मन प्रार्थना की-

" हे भगवान ! इस बार मुझे बचा लो फिर कभी ऐसी गलती नहीं करूंगा ।"

इसके साथ उसने साहस जुटा घर की ओर दौड़ लगा दी , आगे-आगे चिम्मी, पीछे-पीछे कुत्ता , चिम्मी ने हिम्मत नहीं हारी और पूरी ताकत के साथ दौड़ते हुए अपने घर तक पहुंच गया किंतु घर का गेट बंद देख वह हताश हो गया, अब क्या करें ? कुत्ता निश्चित ही मुझे खा जाएगा, यह सोच ही रहा था कि उसे पड़ोस का गेट थोड़ा सा खुला दिखाई दिया, मरता क्या न करता, वह उसी के अंदर घुस गया, आगे कुआं पीछे खाई देख उसका शरीर थरथर कांपने लगा क्योंकि सामने जिम्मी खड़ा था चिम्मी को देखते ही जिम्मी ने उसे आगे बढ़ दबोच लिया और तब तक दबोचे रखा जब तक सड़क का कुत्ता वहां से दूर नहीं चला गया फिर जिम्मी ने अपनी पकड़ ढीली की। चिम्मी स्वयं को जीवित पा आश्चर्यचकित रह गया उसने पूछा-

" जिम्मी भाई! आज तो बहुत अच्छा मौका था तुम मुझे खा सकते थे लेकिन उल्टे तुमने तो मेरे प्राणों की रक्षा की ।"

जिम्मी ने सहृदयता पूर्वक जवाब दिया- 

"चिम्मी भाई! आखिर पड़ोसी धर्म भी तो कुछ होता है मुसीबत में अड़ोसी-पड़ोसी ही एक दूसरे की सहायता नहीं करेंगे तो और कौन करेगा।"

 जिम्मी की उदारता देख चिम्मी उसके चरणों में गिर गया और अपनी गलत सोच के लिए हाथ जोड़ माफी मांगते हुए बोला-

" जिम्मी ! भाई मैने आपके लिए क्या सोचा और क्या पाया मुझे क्षमा करें।"

- मीरा जैन 

उज्जैन, मध्य प्रदेश 


अपनी रचनाओं से संवेदना और स्पष्टता जगाने वाली विख्यात लेखिका श्रीमती मीरा जैन का जन्म 2 नवबंर 1960 को जगदलपुर  (बस्तर) छ.ग. में हुआ, आपने  लघुकथा , आलेख व्यंग्य , कहानी, कविताएं , क्षणिकाएं जैसी लेखन विधाओं में रचनाएं रचकर साहित्य कोश में अमूल्य योगदान दिया है और आपकी 2000 से अधिक रचनाएं विभिन्न भाषाओं की देशी- विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। और आकाशवाणी सरीखे माध्यमों से जनसामान्य के लिए प्रसारित भी।          
आप अनेक मंचो से बाल साहित्य , बालिका महिला सुरक्षा उनका विकास , कन्या भ्रूण हत्या , बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ , बालकों के लैगिंग यौन शोषण , निराश्रित बालक बालिकाओं  को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना स्कूल , कॉलेजों के विद्यार्थियों को नैतिक शिक्षा आदि के अनेक विषयो पर उद्बोधन एवं कार्यशालाएं आयोजित कर चुकी हैं।


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