बीती निशा की वेला
तम का कहर यूँ छूटा
आयी सुबह सुहानी
रक्तिम भानु लुढ़का
नभ की विरल दिशा में
दिनकर प्रभा यूँ फूटी
बीत गया समय
तरुओं की डालियों में
विहगों का मधुर कलरव
दुर्वा की तीक्ष्ण नोकों पे
चमकती तुषार बूँदे
दिनकर की तीव्र किरणें
तुषार बिन्दु पीती
बीत गया समय
निर्झर की मन्द झर-झर
सरिता प्रवाह कल-कल
दिवा पहर यूँ ढलता
ऊषा यूँ गुनगुनाती
गुंठन ये अपना खोले
बीत गया समय
छायी निशा घटायें
अम्बर के पट के भीतर
मुक्ता का तेज चमके
मणिमय कन्दुक लुढ़के
शिशुओं के चक्षुओं को
निद्रा का देते दामन
बीत गया समय ।
- ममता
लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश
ममता जी हिंदी में परास्नातक हैं और इसके साथ अपने स्नातक में इनके पास संस्कृत और दर्शनशास्त्र भी रहा है और आपने शिक्षा शास्त्र में भी स्नातक किया है, इस तरह लोगों को जीवन और स्वयं को लेकर स्पष्टता देने हेतु इनके पास प्रासंगिक सामग्री होने का बोध उनकी रचनाओं से झलकता है।
आप एक शिक्षिका भी है बाल मन की एक बेहतर समझ भी है आप में।
आपकी रचनाएं पाठकों में स्पष्टता, सही काम को लेकर निरंतरता का भाव जगाने में सक्षम हैं।
आपके द्वारा रचित साहित्य, पाठकों को हर संघर्ष के लिए तैयार कर उन्हें एक संवेदनशील, जागरूक और उत्कृष्ट बनाएगा, ऐसा विश्वास है।
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