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मेरी आदर्श- मीराबाई(साहस और प्रेम की प्रतिमा) - सौम्या गुप्ता

एक बार यूं ही बैठे बैठे मैं सोच रही थी कि मैं इतिहास की छात्रा रह रही हूं, अगर मुझसे कोई पूछे कि भारतीय इतिहास में कौन सा पात्र तुमको सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, तो मन में अशोक, अकबर जैसे कुछ नाम आए पर मन को संतोष नहीं हुआ। फिर मुझे कबीर, मीराबाई, सूरदास इन महान लोगों के नाम याद आए। कबीर जी भी मेरी दृष्टि में बहुत अच्छे कवि हैं, उनकी तर्किक बातें और धर्म की बुरी बातों पर आलोचना मुझे सच में बहुत प्रभावित करती है। सूरदास ने भी कृष्ण के बचपन का जो वर्णन किया है वह अद्भुत है। इतनी सारी खूबियों से प्रभावित होने के बाद भी मुझे "मीराबाई" का चरित्र सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।

अब बात आती है ऐसा क्यों?

 इसका एक कारण  है उसे आप भावनात्मक भी कहा सकता है, क्योंकि कृष्ण मेरे भी आराध्य हैं, कृष्ण सूरदास के भी अराध्य हैं पर उनसे थोड़ा सा कम प्रभावित हूं। मीराबाई का उद्देश्य था कृष्ण प्रेम, उसके लिए उन्होंने सारे जतन किए, यहां कृष्ण को आप "सच्चे उद्देश्य" से जोड़कर देखेंगे तो ज्यादा व्यापकता से समझ पाएंगे।

मीराबाई का साहस मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, उस समय जब औरतें घूंघट से बाहर नहीं झांक पाती थीं, उस वक्त भक्ति में मगन मीरा झूठी लोक लाज त्याग कर वृन्दावन चली जाती हैं। उस समय जब स्त्रियां घर में बोलती भी नहीं थी, उन्होंने अपना जीवन अपनी शर्तों पर जिया। तुलसीदास को पत्र लिखा और उनके उत्तर पर कि जिनके हृदय न राम वैदेही,

तजिये ताहि कोटि बैरी सम।

अपना घर छोड़ दिया, इतना साहस उनमें कृष्ण प्रेम के कारण ही आया। ऐसा नहीं था वह केवल कृष्ण से प्रेम करती थी, उन्हें सब की फिक्र थी, उनको विष देने वालों की भी। मेरे लिए मीराबाई एक आदर्श है, वह कृष्ण के प्रेम में डूबी, पर उनका प्रेम उनका साहस बना, उनको ऊंचाईयां दी, उनको अमर कर दिया।

वह मुझे महिला सशक्तीकरण की अग्रदूत लगती हैं, कि मैं यह लक्ष्य चाहती हूं और अगर लक्ष्य सही है, सच के साथ और जनहित या आत्म उन्नति के लिए है तो सबकुछ कुबूल है, घर छोड़ना, बाहरी आंधी-पानी, असुरक्षा। वो चाहती तो रोती रहती कि मेरी भक्ति में मेरे ससुराल वाले ही बाधक बन रहे हैं, पर उन्होंने रोना नहीं लड़ना चुना, सांप भेजो, विष भेजो, मीराबाई को सब स्वीकार था क्योंकि उनके पास कृष्ण आज के संदर्भ में सही उद्देश्य था।

वह दर्पण सी पवित्र बनी। आज की स्त्री चाहे तो अपने उद्देशय को ना पाने का कारण दूसरों को बताती रहे, या तो लड़ जाए। मैंने एक बार कहीं सुना था और यह बात मेरे संघर्षों के दौर में ज्योति बनकर मेरे साथ रहती है कि 

"कृष्ण है तो जहर का प्याला आएगा ही",

 जहर का प्याला नहीं आया है तो मान कर चलना कि कृष्णा भी नहीं मिले हैं।  

मैं कृष्ण पर ध्यान केन्द्रित करती हूं और जहर का प्याला अपने आप ही अमृत में बदल जाता है, जैसे मीरा बाई का बदल जाता था।

यहां पर कृष्ण सिर्फ भगवान कृष्ण से नहीं है, कोई भी उद्देश्य यदि सच्चा है तो उसके लिए हमारे भीतर मीराबाई सा समर्पण होना चाहिए।

शुभकामनाएं 

- सौम्या गुप्ता 


सौम्या गुप्ता जी इतिहास मे परास्नातक हैं और शिक्षण का अनुभव रखने के साथ समसामयिक विषयों पर लेखन और चिंतन उनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनकी रचनाओं से जीवन, मानव संवेदना एवं मानव जीवन के संघर्षों की एक बेहतर समझ हांसिल की जा सकती है, वो बताती हैं कि उनकी किसी रचना से यदि कोई एक व्यक्ति भी लाभान्वित हो जाये, उसे कुछ स्पष्टता, कुछ साहस मिल जाये, या उसमे लोगों की/समाज की दिक्कतों के प्रति संवेदना जाग्रत हो जाये तो वो अपनी रचना को सफल मानेंगी, उनका विश्वास है कि समाज से पाने की कामना से बेहतर है समाज को कुछ देने के प्रयास जिससे शांति और स्वतंत्रता का दायरा बढे | 


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शुभकामनाएं