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दर्शन एक कठिन विषय क्यों है? एक प्रयास इस पर स्पष्टता देने का

देश के जाने माने पूर्व प्रशासनिक सेवा अधिकारी डॉ विजय अग्रवाल सर के आज के लाइफ मैनेजमेंट के ऑडियो का सन्दर्भ लेते हुए मै इस विषय पर अपनी समझ साझा कर रहा हूँ (ऑडियो का लिंक - LM 22-09-25):

इस लेक्चर में डॉ साहब अपनी प्रिय शिष्या सौम्या जी जोकि इतिहास में परास्नातक हैं के एक प्रश्न का जवाब देते हुए कहते हैं कि जैसे हर गाना गाने वाला इंसान गायन की बारीकियों को नहीं समझता, वैसे ही हर जीने वाला शख्स, जीवन की बारीकियों को नहीं समझता, दर्शन इसीलिए एक कठिन विषय है क्योंकि जीवन एक शतरंज की बिसात की तरह है जो हर चाल के बाद बदल जाती है, ऐसे ही हमारे जीवन की परिस्थितियां बदलने से, तरीके, कदम और निर्णय बदलने पड़ सकते हैं |(सन्दर्भ के लिए ऊपर के लिंक से ऑडियो सुनें)


अब कुछ अपनी बात, मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है की जीवन जीने के कई तरीके  हैं ( तरीका निर्भर करता हैं  दर्शन पर माने आप जीवन को लेते कैसे हैं, कैसे देखते हैं आप जीवन को, उच्च प्राथमिकता में किस चीज़ को रखते हैं  ) अब क्योंकि आपके द्वारा जीवन को देखने का नजरिया उस वक़्त की परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है, इसीलिए दर्शन एक कठिन विषय जान पड़ता है क्योंकि इसमें अनुभव करने का पहलू शामिल है| 


भारतीय दर्शन की दो मुख्य धाराएँ आस्तिक और नास्तिक हैं। आस्तिक दर्शनों में छह मुख्य दर्शन शामिल हैं : न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा (पूर्वमीमांसा) और वेदान्त। वहीं, नास्तिक दर्शनों में चार्वाक, बौद्ध और जैन दर्शन प्रमुख हैं।  


जब जीवन ही कठिन जान पड़ता है तो दर्शन भी कठिन जान पड़ता है, एक कारण हो सकता है लम्बे समय से चला आ रहा झूठ, हमारे जीवन की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए डर, लालच और मोह से मुक्ति जोकि स्पष्टता (स्वयं को लेकर और इस दुनिया को लेकर ) और आत्मनिर्भरता से मिलनी है और आनंद के लिए कार्य में उत्कृष्टता, लेकिन आजकल क्या हो रहा है लोग मन बहलाने वाले सतही सुख को पाना चाहते हैं', अहंकार को पुष्ट करने को दिखावा करके लोगों से तारीफ पाना चाहते हैं और डर और असुरक्षा की भावना के चलते एक दूसरे से भेदभाव करते हैं अनैतिक तरीके से दूसरों की असुविधा और गरिमा की परवाह किये बिना बस असीमित धन और शक्ति हांसिल करना चाहते हैं, ऐसा ही होने के चलते जीवन जटिल होता जा रहा है लोगों का |


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